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“ Indian Development Model under Sovereignty  &  Diversity ”

-With Special Reference To Enhance Democratic Society.

 

 

भारत, यह नाम सुनते ही कुछ वे सिद्धांत दुनिया, जोड़ने और अनुभव करने लगती है, अतीत से गर्वोन्नत और वर्त्तमान में अव्वल समाज की। यह देश आदर्श केवल धर्म, संस्कृति, सामाजिक वातावरण से नहीं बना है, अपितु इसका अपना सर्वभौमिक सबको सहेजने, समझने, साथ लेने की संरचना ने इसे दीर्घकालिक बनाया है।

 

दुनिया में हर देश जब अपने ही प्रतिमान को सर्वसम्मति से और सर्वश्रेष्ठ बता थोपने को आतुर है, तब आवश्यकता आन पड़ती है कि भारत यहां आयातक की भूमिका में हो या की निर्यातक बन दुनिया को राह दिखाये। एक तरफ वो देश-समाज-वातावरण है जहां एकरूपता है, सब कुछ सपाट सा, दूसरी ओर भाषा-ढांचा और बर्फ-नदी-मैदान- रेगिस्तान-समुद्र सब विविधताओं के बाद भी विश्व को नेतृत्व देता भारत।

 

केवल राजनैतिक नहीं, सामाजिक-आर्थिक-विद्या-विज्ञान -प्रौद्योगिकी-क्रीड़ा-अनुसन्धान सभी तो क्षेत्रों में हम मौलिक है, श्रेष्ठ विचार, आचरण से सार्वजनीन, मानवतावादी और सृष्टि के कल्याण के उच्चादर्शों से ओतप्रोत। तो फिर, भारत के विकास का प्रतिमान क्या हो?

वाराणसी, काशी बनें की क्योटो, बेशक केवल अतीत सही, पर नवीन ही केवल क्यों?

 

जिस देश में प्रत्येक प्रान्त में ही भाषा-वातावरण का आमूलचूल परिवर्तन हो वहां कोई एक प्रतिमान सफल-उचित कैसे हो सकता है, पहाड़ी रेगिस्तान लद्दाख और मिट्टी के समंदर राजस्थान के लिए कोई एक समाधान नहीं हो सकता। गंगासागर के छिछले जल क्षेत्र और कच्छ के रण में भी कोई और विभिन्नता का प्रारूप चाहिए। आखिर ऐसा क्या हुआ कि चार महिने बर्फबारी वाले शिमला में पेयजल संकट, सदानीरा नदियों से घिरे केरल में बाढ़, कुम्भ नगरी उज्जैन में क्षिप्रा की पूर्ति के लिए नर्मदा का अवलंबन, जगतारक केदारनाथ विनाश का कारक, जमुना नदी का अस्तित्व का प्रश्न पैदा हुआ।

 

भारत का विकास का प्रतिमान उसकी अपनी शस्यश्यामल धरती में सन्निहित है, यहां का हर एक बुजुर्ग नई परिभाषा में अनपढ़ सही तो भी,  पारंगत है। विद्या-वैभव है, पर उपयोग हो। सामर्थ्य का होना, उसका उपयोगी होने पर परिणामकारक होता है। देश की संप्रभुता, संविधान प्रदत्त नागरिक शासन की अवधारणा में विकास के प्रतिमान तय-नियत होने चाहिए, निष्ठा विविधता में हो, बहुलता आधारित समाज और संस्कृति के साथ यह भारत राष्ट्र का मौलिक चिन्तन है।

 

मैं रहूँ या रहूँ, भारत यह रहना चाहिए। यह भाव केवल तब ही साक्षात होगा जब भाषाएँ बचेगी, खान-पान की विविधता रहेगी, जलवायु का अंतर संरक्षित रहेगा, स्थापत्य रहेगा, वस्तुतः विविधता से विभिन्नता तक का यह आवरण ही, अपने इस समाज के विकास का वह प्रतिमान है, जिसमें देश की सम्प्रभुता, निजत्व स्वाभिमान का पुट है।